आओ एक धर बनाते हैं...
आओ एक धर बनाते हैं , खुबसूरत और रूहानी एक शहर बनाते हैं , इ़ल्म और इश्क़ की एक नहर बनाते हैं , जो गुज़रे हर दिल के दरमियान से , कच्चे पक्के हर मकान से , जो बहा दे, डुबा दे , नफ़रत के सामान को , बना दे जन्नत ज़मीन को , नहीं आसमान को । आओ एक घर बनाते हैं , खुबसूरत और रूहानी एक शहर बनाते हैं ।
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