पहला कथन
इस दौड़ती दुनिया में मैं किससे बात करूँ? किससे गुप्तगू करूँ? किससे मैं मज़ाक करूँ?00 शब्दों का यहाँ खेल है निराला, शब्द छुपा लेते हैं मन का उजियाला। कोई कहता कुछ और है, हम समझते सब कुछ हैं — पर उत्तर की गहराइयों में उलझते सिर्फ हम हैं। कुछ अरसे हो गए हैं, हमने उत्तर देना छोड़ दिया है, अब तो सिर्फ नयनों से देखते हैं, सिर्फ कानों से सुनते हैं। कभी बोलते थे मन से — अब मन भी चुप रहने लगा है। इस अभ्यास ने हमें मौन कर दिया, बोलने की कला से वंचित कर दिया। इसी उलझन में मैं फँसा रहा, मन जकड़ा था, विचार ठहरा था। तभी कलम उठी — स्याही से भरी हुई थी। सोचा — क्यों न इसे आज़माया जाए? जो कहना था — वो सब लिख डाला। मन एक स्वर में बोलता गया, कलम चुपचाप उसे दोहराती गई। शब्द उतरते गए पन्नों पर, और भीतर कहीं शांति उतरती गई। अब कुछ बाकी नहीं रहा — ना प्रश्न, ना उत्तर। मन शून्य होता चला गया, जैसे सब कह दिया हो और फिर कुछ भी न बचा हो।
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