ग़ज़ल: "हर किसी का आख़िर आख़िर
हर किसी का आख़िर, आख़िरी सफ़र समझकर, मुस्कुराते रहे हम, कहते रहे अलविदा... चेहरों पे अनजानी, एक ख़ुशी जो बसी थी, लगता था हर कोई, अपना-सा लग रहा... ना ऊँच-नीच देखे, ना अमीरी-ग़रीबी, वक़्त का यह खेल, सब पर ही चल रहा... कुछ चेहरे भुला दिए, कुछ याद रह गए हैं, कुछ लम्हें मुस्कुरा कर, रस्तों में खो गया...
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