तुम क्या समझ आए ...
चाहती थी तुम मेरी खामोशी पढ़लो तुम तो मेरे अल्फाज तक ना समझ पाए, मेरा ख्वाब था तुम आखिर तक साथ चलो मेरे पर तुम तो हकीकत में मेरा हाथ छोड़ आए, मैंने चाहा था तुम्हारे चेहरे की मुस्कान बनना तुम तो मुझे वीरान समझ आए, मैंने चाहा था जीवन भर तुम्हारे साथ चलना तुम तो मुझे कुछ वक्त की लाँठी का सहारा समझ आए, मैंने चाहा प्रेम की बगियाँ से तुम्हारा जीवन महकाना तुम तो अपनी मौजुदगी से उस बगियाँ को सींचना भूल आए मैंने चाहा था तुम्हारा घर बनना तुम तो मुझे बारिश से बचनें के लिए एक कोने में खडी़ कुटिया समझ आए, मैंने चाहा था तुम्हारी हमसफर बनना तुम तो मुझे सफर में मिला एक अंजान मुसाफिर समझ आए.... देखों ना मैनें चाहा था क्या और तुम मुझें क्या समझ आए ।। वंशिका चंद्रवंशी ||
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