**बदलाव और सच**
न जाने ये सुबह अब इतनी क्यों बदल गई, हर चेहरा अजनबी-सा, हर राहत अलग सी। कहते हैं, "बदला हूँ मैं, अलग हूँ मैं," पर ये बदलाव क्यों इतना अकेला सा है? मैं तो नहीं बदला, बस किसी ने बदला सा दिखाया है, अच्छा-बुरा नहीं हूँ, बस बताया गया है। पर सच मानूं तो तुममें भी नहीं इतनी हिम्मत, जो सोच सको इतना अंदर तक, जो दिखाया गया है। जो रंग थे कभी, वो फीके क्यों पड़ गए? जो सपने थे, वो धुंधले क्यों हो गए? खुद से ही ये सवाल, खुद से ही ये जंग, क्या बदलाव ही है जीवन का अंतिम संग? जो भी कुछ है, नफ़रत की चिंगारी है, वरना हम तो पहले बड़े ख़ुश थे, आपके करीब थे। आज तुम्हारे लिए ही शैतान कैसे हुए, सोचना ज़रूर है या दिखाया गया है। खैर, जिस आईने ने भी दिखाया है हमको ऐसा, जो तुम्हें लगता है आईने पर हक़ीक़त नहीं है। एक स्नैप का फ़िल्टर है, jo हक़ीक़त ko चुरा kar , हमारे ,हर नज़ारे को बदल देता है। किरदार तो हमारा इतना भी बुरा न था, वक़्त तो हमारा इतना भी बुरा न था। क्या है सच है, या दिखाया गया है? हमें क्यों इस तरह अकेला करने को फंसाया गया है ! by, Mahendra.
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