भीगते जज़्बात
( भीगते जज़्बात ) हो रहा है मद्धम मद्धम सावन का आगाज़ हो रहा है मद्धम मद्धम सावन का आगाज़ उमड़ रहे हैं कितने दिलों में अनगिनत से भीगते जज़्बात नव कलियों सी प्रस्फुटित होती न जाने कितनी मुस्कुराहटे जैसे कोयल की कुक संग गौरी के प्रीत मिलन की चाहतें खुशियों की हर और होने वाली है बहार बारिश की बूंदों में छलकेगा अपनों का प्यार झलकेगी नव विवाहितों की अपार ख्वाहिशें गर्म गर्म पकौड़ों के जायकों का लिया जाएगा आनंद बूंदों के एहसास को जिएंगे होकर सब उन्मुक्त बचपन की यादों को आओ करे जीवंत कागज की नाव बनाकर मिलकर खेलें सब साथी जिनमें निहित थे कितने भीगते से जज़्बात फ़िर से तलाशें उन पलों को बनकर वो सारथी मयूर बनकर नृत्य कर तलाशें वहीं कोने जिसमें खेला करते थे बचपन में सभी खिलौने बारिश के इस मौसम ने कितने दिलों को जोड़ा है हर युगल के मन की हर एक बात का रुख रोमांच की तरफ मोड़ा है, चलो ले चलती हूँ अपने जीवन के किस्सों की ओर सावन का आगाज़ हुआ और था मस्ती और झूलों का वो दौर भोलेनाथ जी की अराधना संग खुब सजते मेले थे जहां सभी कभी न होते अकेले थे भीगते एहसासों ने आज सजाया साज़ है सावन आते ही होता त्योहारों का आगाज़ है भीगे भीगे जज्बातों सी ये कैसी आशा है बनकर जल तरंग बस इनमें खो जाने की अभिलाषा है | स्वाति की कलम से ✍️
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