दो राहें
देर करूँ तो कुछ छूट जाता है, जल्दी करूँ तो ग़लत हो जाता है, ज़िन्दगी इन दो राहों में अटकी रहती है, हर सुबह एक नई उलझन लेकर आती है। प्यार था, मगर वक़्त साथ नहीं था, काम मिला, पर दिल कभी राज़ी नहीं था, रिश्ते बचाए तो खुद से दूर हो गया, खुशियाँ चुनीं, मगर तन्हा सा हो गया। सोचा था, एक दिन सब ठीक हो जाएगा, पर हर मोड़ पर कुछ न कुछ छूट जाएगा। अब समझा हूँ, वक़्त के साथ बहना है, बस खुद के साथ ही चलना है।
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