श्री कृष्ण का दिव्य स्वरूप
विराजते हो द्वारका में, अंतरिक्ष सा विशाल, तेरा हर रूप अद्वितीय, है अनंत की मिसाल। मुरली की मधुर ध्वनि में, छिपा जगत का सार, हर सुर में तेरी लीला, हर लय में प्यार। रास की उस रात में, चाँद भी था चकित, तेरे नृत्य की चाल में, सृष्टि थी अचंभित। गोवर्धन के तले, तूने जग को समझाया, संकट के समय में, साहस ही भगवान है। ज्ञान का तू है सागर, प्रेम का तू प्रकाश, तेरे नाम से धुल जाते, जीवन के सब पाप। अर्जुन को तूने सिखाया, कर्म का महान व्रत, हर श्वास में तेरा नाम, हर भाव में तेरा सत्य। तूने दिखाया मार्ग, योग और भक्ति का, तेरे चरणों में समर्पण, है मोक्ष की ज्योति का। हे मधुसूदन, हे गोपाल, मेरे मन का तू आधार, तेरे बिना ये जीवन, जैसे सूखा रेगिस्तान। स्मरण करूं तेरा, जब भी हो मुश्किलें, तेरी कृपा से मिट जाएं, सारी उलझनें। हे वासुदेव, तुझसे मिलन की आस में, जीवन की ये यात्रा, पूर्ण हो तेरे प्रकाश में।
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