प्रेम
आज आखिरी संदेश आया उसका कब तक आ जाओगे यहाँ उसकी यादों से खुद का शृंगार कर मैं निकल पड़ा, कुछ अनकहा लिए वहाँ उसे देखा तो यूँ लगा मुझको जैसे सजने का हर अर्थ आज मिला मानो हर श्रंगार का स्रोत वहीं और मैं बस एक ठहरा हआ सिलसिला वो चली मंडप की ओर चुपचाप शीश झुका, नज़़रें जमीन से जुड़ी रही देख तो उसे ही रहा था लेकिन मेरे हृदय की नजरें उसे ना देख सकी प्रेम का अर्थ समझाने तुम्हे मेरे जीवन में आना था किंतु इस कथा का अंत, हरि को यहीं कराना था ✍️सुब्रत मिश्रा
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