कलयुग की द्रौपदी
जय नारी ,सबल नारी का आज ही हम क्यों उद्घोष करे क्यों न नारी के पवित्रता और सामर्थ्यता का सफल संयोग करे मैं कलयुग की द्रौपदी हूं व्याकुलता नहीं है चीर रखवारी की माधव ने तीर तलवार सिखाया है रुकू न मैं इसीलिए गीता का ज्ञान पढ़ाया है दुर्योधन जैसी सोचो को पांव तले कुचलना सिखाया है वस्तु नहीं मैं भोगों की ये कहकर प्रतिवाद करना सिखाया है यदि फिर भी साहस है आंख दिखाने का तो दिखाओ यदि साहस है बांह पकड़ने का तो हाथ बढ़ाओ यदि साहस है मुझे बांधने का तो जंजीरे लगाओ यदि आज भी मुझे दांव पर लगाने का साहस है तो लगाओ अंजाम वही होगा जो कल हुआ था लेकिन इस बार ये द्रौपदी रण में उतरेगी अपने स्वाभिमान की रक्षा स्वयं कर लेगी भृकुटी देखना तुम काल सम प्रलयमान होगी दुशासन तेरा खून लेने को रण चंडी की गर्जना होगी उस कुरूसभा में प्रार्थना नहीं अब याज्ञसेनी करेगी अब वो स्वयं शस्त्रों का श्रृंगार करेगी जलती ज्वाला जैसी अब युद्धों के मैदानों में उतरेगी अब नहीं वो अबला बनकर अपने प्रारब्धों को भोगेगी
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