जिंदगी
शहर-दर-शहर यूं ही , मैं भटकता रहा । जिंदगी भर मैं बस , खुद को ही बदलता रहा।। ठोकरें खा- खा कर, हर कदम पर गिरा। फिर भी गिर कर, मैं खुद ही संभलते रहा।। रुलाने की कोशिश तो, बहुत की थी उस दौर ने। मगर मैं जिंदगी के, हर दौर में मुस्कुराता रहा ।।
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