नववर्ष
देखो आया नववर्ष सुहावन,हो गई है धरा कितनी पावन देखो आया नववर्ष सुहावन। शश्य श्यामला धरती माता, अमृत रस बरसा रही है प्रकृति का नव अंकुर फूटा है, चिड़िया चहचहा रही हैं प्रातः भोर की बेला में,मौसम है कितना मनभावन देखो आया नववर्ष सुहावन। जब प्रकृति हो उदासीन, फिर से बरसाए स्नेह सुधा पाकर के स्नेह रस,हो प्रफुल्लित,हर घर में लहरे धर्म ध्वजा जगजननी के जयकारों से,हर गांव गली हो जाए शोर घड़ी घंट और ताल मृदंगा, गूंजे शंख ध्वनि जोर जोर और अम्बे मां के आगमन से,हुए भक्त लोग हैं भाव विभोर सकारात्मक पहलू से परिपूर्ण, ये वक्त बड़ा है मनभावन देखो आया नववर्ष सुहावन। एक सुंदर सी मनमोहक गंध, मोह रही है सबका मन खुश है किसान,खुश है जवान,हुए निरोग है सबके तन प्रातः काल, ब्रह्म मुहूर्त,मंगल बेला में वर्ष परिवर्तन देखो आया नववर्ष सुहावन। चैत्र मास,मधुमास है पक्ष शुक्ल, तिथि प्रतिपदा की खास है संवत का शुभारंभ हो रहा,सर्वत्र खुशियों का वास है नववर्ष का त्योहार है,नववर्ष का उल्लास है। - उत्कर्ष पाठक "उत्पल"
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