आषाढ़ की रात
ये सन-सन हवाएं और झर-झर फुहारें, मन में हल्की सी गुदगुदी ला रही है। झींगुर की झीं झीं , मेढक की टर्राहट, ये कर्णप्रिय आवाजें उर को भा रही है।। गलियों में बहती अविरल जलधाराएं, मधुर स्वर भी रह रह कर आ रही है। जलकण की छीटें,दामिनी की चमक, अधखुली गवाक्षों से बेधड़क समा रही है।। कभी सोंधी माटी की ,कभी सीलन की, अतिगन्ध भी रह रह कर आ रही है। आषाढ़ मास की ये मदमस्त रातें, मानो लोरी सुना कर सुला रही है।। नरेंद्र 08.07.2024
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
