चाँद और नींद
वो आसमां का टुकड़ा, वो रात का हमसाया, हैरान हूँ कि क्यों उसने मुझे इतना लुभाया? क्या मेरा प्यार सिर्फ उसकी चांदनी तक है सीमित, या सुबह की पहली किरण ने मुझे उसे भुलाना सिखाया? जब तक जागूं, वो मेरा राज़दार लगता है, उसके चेहरे पे दाग भी, मुझे श्रृंगार लगता है। मेरी तन्हाइयों को वो चुपके से सुनता है, एक अजनबी होकर भी, वो बहुत अपना सा लगता है। पर जैसे ही पलकें जुक्ने लगती हैं, ख्वाबों की दुनिया हकीकत को खोने लगती है। मैं सो जाती हूँ उसे अकेला छोड़ कर वहीं, और मेरी वफा, अंधेरों में कहीं रोने लगती है। वो जागता रहता है मेरे सिरहाने रात भर, मैं मुसाफिर हूँ, सो जाती हूँ डगर बदल कर l शायद मैं उसे सिर्फ अपनी ज़रूरत के लिए चाहती हूँ, वरना सूरज के आते ही, क्यों ना रही उसकी कोई खबर? वो तो वफादार है, जो हर रात लौट आता है, मैं ही हूँ जो नींद आते ही, उसे भूल जाती हूँ।
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