गुरबत
हम खाक छानते आ रहे जमाने से वो हीरे मोती चुग रहे खजाने से। दरख़तो में सिमट के रह गई जिंदगी हमारी गुरबत की बू ऐसी, जो आज तक नहीं गई नहाने से।।
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