स्त्रीवादी स्वर
ना समझो मुझे सयानी, मैं उलझनों से भरी एक कहानी हु। मैं इतनी भी सच्ची नहीं। कड़वा लगे जो सच मेरा, पर मैं इतनी भी अच्छी नहीं। मैं सच बोलती हु इसलिए , शायद मैं मीठी नहीं, खुद को महान बताती नहीं। खैर, किसी का दिल दुखाऊँ, ऐसी मेरी नीयत नहीं। अनजाने में अगर चोट लगे, तो उसका मुझे भान नहीं। बदतमीज़ी का जवाब देना, मुझे भी आता है । चुप रहना मेरी कमजोरी नहीं, अकल की कच्ची नहीं, बस सादगी की सच्ची हु। कड़वा है सच, मानो या न मानो, पर इसमें कोई मिलावट नहीं। खैर, कह दूँ फिर एक बार— मैं उतनी भी सच्ची नहीं। उतनी भी सच्ची नहीं।
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