अनकही लफ्ज़
वो मर्द भी कितने हसीन होते हैं जो बोझ उठाते हैं ना कहकर भी, जो मुस्कुराते हैं हर ग़म सहकर भी। ना सिर्फ़ समझते हैं अपनी ज़िम्मेदारियाँ, बल्कि समझते हैं सबकी मजबूरियाँ। माँ की थकी हुई आँखों की भाषा, बाप के खामोश संघर्ष की आशा। बहन की उम्मीदों का दीप जलाते हैं, हर रिश्ते को दिल से निभाते हैं। कभी बेटे, कभी भाई, कभी पति बन जाते हैं, हर किरदार में खुद को खो जाते हैं। पर कौन समझता है उनके दिल की सदा? कौन पूछता है — "तू ठीक है न ज़रा?" ना शिकायत, ना कोई गिला करते हैं, बस हर दिन एक नया जंग लड़ते हैं। वो मर्द भी इंसान हैं, पत्थर नहीं, उनके भी जज़्बात हैं, पर दिखते कहीं नहीं। एक बार उन्हें भी समझो, बस थोड़ा सा, क्योंकि वो भी जीते हैं, सिर्फ़ अपनों के लिए हमेशा।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
