कवितांश
भीष्म की तरह मैं भी व्रत में हूँ, पर मेरा व्रत प्रेम का नहीं... भूलने का है। और हर दिन, उसकी यादों का शर मेरी आत्मा में धँसता है, जैसे भीष्म की देह में अर्जुन के बाण।
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