बेवकूफ जो ठहरे।
खैर मुहासब थे हम जो ये समझ ना पाए, सब कुछ पा जाने की चाहत में ये गुस्ताखी कर आये। सच कहता हु कहकर, जाने कितने ही झूठ बोल डाले, अजमल बनने की चाहत में, सारे रुख ही मोड डाले। कभी न समझ पाए जीवन के अफसाने, जब करना था खुद पर खिदमत, तब कोसते रहे दुनिया सारी, होना क्या था, फिर मिल गए सारे प्रश्नों के जवाब मुझे, बनने जो चले थे लाजवाब अब बन के रह गए है बेहिसाब। दो पल को लगा जेसे सब तबाह होगया, जो बना फिर रहा था शेर, अब खुद से ही सब तबाह कर गया। कटने लगा था उसे बदनामी का डर, गुनाह करने से पहले सोचा नहीं था मगर, अब जो किया है उसका फल पाना तो पड़ेगा, यही तो दुनिया है ग़ालिब इससे निभाना तो पड़ेगा।
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