हाथ और आवाज़
एक आवाज़ जो उठती है सच के लिए एक हाथ जो उठता है हक़ के लिए जिस आवाज़ को गूंज नहीं मिलती जिस हाथ को सहारे नहीं मिलते वो आवाज़ दबा दी जाती है वो हाथ काट दिए जाते हैं आवाज़ खो जाती है दुनिया के शोर में कहीं कटे हाथों को कोई भी ढूंढता नहीं फिर दशकों तक दब जाने, कट जाने के खौफ से न उठती कोई आवाज़,न उठता कोई हाथ अपने में घुटते जीते हैं सब मगर नहीं देता कोई किसी का साथ यूहीं अगर होता है, यूहीं अगर होता रहेगा जो हाथ आज किसी और का है कल वही हाथ हमारा होगा । अरुण सर्वेश
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