शीर्षक :कइसन नयका साल
चौबीस के चाबुक बड़ी पड़ल , अब पचीस के आइल बारी हे। गरीब के घर झाँक के देखs, कुछो नैय तनिको तैयारी हे।। ई सब हे पेटभरन के चोचला, जे अंग्रेजवन से रखले यारी हे। बारह बजे से हे छटपटाइत ऊ एकरा चढ़ल बड़का खुमारी हे।। गरीब जनता के हे हाड़ टूटल, मंहगाई के मारल ई बिचारी हे। कइसन होवs हे नयका साल, ओकरा त पेटे से मारामारी हे।। पइसा से नितरइते देखली राते, फटाका फोड़लक ऊ भारी हल। सबेरे देखली ओकर घर तर से उदास लौट रहल भिखारी हल।। नरेंद्र सिंह, अतरी 01.01.2025
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