मानव बस एक खिलौना है
सहसा बैठी एक दिन खिन्नित होकर मैं जब सब नश्वर है तो फिर क्यूं रचा है ईश्वर ने जो आज सशक्त सार्थक है उनको कल निरस्त निरर्थक होना है जो आज जय की ओर अग्रसर है कल उनको पराजय के आश्रित होना है धर्म अधर्म सत्य सत्य कपट में क्या अंतर है जब सबको काल के चक्र में ही खोना है जब कहते हो की सब कुछ उन ईश्वर की इच्छा से ही होना है तो फिर किए हुए कर्मों का परिणामी हमको ही क्यूं होना है क्या इस विराट जगत में मानव बस एक खिलौना है
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