हर फ़ैसला होता है घर के हिसाब
अब हक़ भी मिलता है डर के हिसाब से, हर फ़ैसला होता है घर के हिसाब से। क़र्ज़, रिश्ते, छत, फ़िक्र — सब मैं ही हूँ, अब नाम पूछो, तो दस्तूर के हिसाब से। ख़्वाब कहां अब बेपरवाह उड़ते हैं, उड़ान भी मिलती है हद के हिसाब से। चेहरा वही है, आइना चुप है मगर, अब दर्द दिखता है नज़र के हिसाब से। हम हँस भी लेते हैं वक़्त पर मगर, अब आंसू गिरते हैं शरम के हिसाब से। 'सागर' भी अब हँसता है हालात देखकर, हर ग़म जिया गया फ़र्ज़ के हिसाब से।
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