फ़र्ज़
ये सब सम्मोहित माया समझके, चंचल मन के चोचाले फेंक के, हृदय की हीन भावना को त्याग के, अब होंगे सारे फैसले फर्ज़ मन के। अब बस फ़र्ज़ मन से, फ़र्ज़ मन से, फ़र्ज़ मन से…! जो हुआ है, उसे स्वीकार करते हुए, अपने आप को सम्पूर्ण अपनाते हुए, लेकर अपनी जिम्मेदारी सारी आगे, अब बस फ़र्ज़ मन से, फ़र्ज़ मन से, फ़र्ज़ मन से…! अब एक बार जो फैसला हो जाएगा, फिर न हटेंगे, न देखेंगे मुड़कर दोबारा। हम भी हैं छत्रपति के मिट्टी के वंशज, मरकर भी नहीं हट्टे वे मराठे। बचेंगे तो और भी लड़ेंगे, फिर जो होगा, वो देखा जाएगा। अब बस फ़र्ज़ मन से, फ़र्ज़ मन से, फ़र्ज़ मन से…! - By SHIV ( 05/07/2025)
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