नारी होना आसान नहीं
संघर्षों की अग्नि में तपकर, वो सोने-सा निखरती है, हर बंधन को प्रेम से थामे, घर-आंगन को सँवारती है। बेटी, बहन, पत्नी, माँ—हर रूप को अपनाती है, स्नेह, समर्पण और शक्ति की वह फिर मूरत बन जाती है। संतुलन की डोर पकड़े, हर मोड़ पर मुस्कुराती है, दर्द सहकर भी इस दुनिया में वो बस खुशियाँ ही लुटाती है। नारी बिना सब अधूरे, ये सृष्टि भी सुनसान लगे, शिव की गौरी, राम की सिया, और हरि भी तो श्री के संग जचे। सम्मान ही उसका गहना, यही उसका अभिमान है नारी का अपमान हो, क्या इसमें भी कोई शान है? नारी का अपमान हो, इसमें कोई शान नहीं नारी होना आसान नहीं
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