पाप और पुण्य: कर्म का फल
तन को धोकर केवल मैल हटाएगा, पापी मन का ऋण कब चुकाएगा? कुंभ नहाओ या फिर जाओ महाकुंभ, कर्म से बच कर तू निकल न पाएगा? गोमुख से सुंदरवन तक जिसका विचरण है, धर्म मान्यताओं में अति पावन उसका जल है, मां जो भोले की जटाओं से निकल कर आई है, श्राप में अस्थियां ढोने की उसने भी सजा पाई है। फिर तू कैसा बहम पाले बैठा है, यात्राओं से पाप मिटाने निकला है, कुचलकर लोगों को कैसा मोक्ष दिलाओगे? पाप की गठरी से कैसा पुण्य कमाओगे? घर तुम्हारे जो अकेले हो चुके बूढ़े शरीर हैं, उन पर क्या बीत रही बस वही जानते पीर हैं, जब तक छोड़ उन्हें तीर्थों में तुम पुण्य मांगोगे, व्यर्थ ही जाएगा सब और कर्मों के फल भोगोगे। फिर यही दोहराता हूं कर्मों का ही माप तौल है, अपने मन की गठरी खोल दे बंदे यहीं सब झोल है, दुखी न कर किसी को न किसी की आह ले, जो है तेरे पास पहले उसकी तो परवाह ले। अच्छा हो या बुरा सब तेरे ही झोली में जाएगा, ये तुझ पर है अब कि तू इसमें क्या लेकर आएगा? कर्मों से तेरे वजूद अगर तुझे दुआएं जी भर देंगे, सभी तीर्थ और धाम तुझे बिन बुलाए पावन कर देंगे। घर तुम्हारे जो अकेले हो चुके बूढ़े शरीर हैं, उन पर क्या बीत रही बस वही जानते पीर हैं, जब तक छोड़ उन्हें तीर्थों में तुम पुण्य मांगोगे, व्यर्थ ही जाएगा सब और कर्मों के फल भोगोगे
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