_अनजान सफर
अनजान सफर अनजान रास्तों से शुरू हुई एक सफर, क्या होगा अंत इसका नहीं था कोई खबर, दुःख,तकलीफ,दर्द मिले बहुत पर थे उमंग में ना हुआ कोई असर, ठोकरें खाई कई पर थे खुद के ही जिंदगी से बेखबर, अब जब सोचता हुआ की खोया क्या और पाया क्या तो खुद को खुद में पाता हूं बेअसर, कोई तो मंजिल दिखे इन तन्हा रास्तों पर कोई तो संभाल ले चले सही वास्तों पर, सोचता हूं रोता हूं खुद ही खुद में खो जाता हूं बस मंजिल अब मिलेगी ये सोच आंसू भरे आंख को लिए तन्हा सो जाता हूं।। लेखक:- ✍️सौरभ झा
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