इल्तिजा-ए-बेगुनाही
जो गुनाह मैंने किया भी नहीं, उसकी तक माफ़ी माँगी, मैंने पत्थर के सामने टूटे रिश्तों को जोड़ने की भीख माँगी। मैंने अपनी ज़िंदगी का कोई लम्हा उसके बग़ैर सोचा ही नहीं, उसने मेरे मर जाने की दुआ अपने ख़ुदा से माँगी।
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