समंदर
ये कौन बहता है मेरी ग़ज़लों में खुशबू बनकर या कि हवा बनकर मेरी जुस्तजू बन कर ये कौन बहता है..........................! मेरे खुदारा उसी फ़ज़ा में आरज़ू है दफ़न चांद देखें हैं जिसे शब भर हरसू बनकर ये कौन बहता है..........................l अब भी सुबहों में बसी हैं उसी ज़मीं की सदा जिससे गुजरे थे कभी,हम रंग ए रु बनकर ये कौन बहता है.......................... जिसकी आहट से सदाएं भी खुशफाम दिखीं रूह बसती है पर पे कू-ब -कू बनकर ये कौन बहता है.......................... राजीव
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