मंज़ूरी नहीं
मेरा सारा प्यार तुम्हारा है, बस, दुनिया को बताना मेरी मंज़ूरी नहीं। यह जो हृदय में दीप जलता है, उसे सबके आगे दिखाना मेरी मंज़ूरी नहीं। तुम जानते हो मेरे मन मैं बस्ते हो तुम , यह समर्पण किसी प्रमाण का मोहताज नहीं, इस पवित्र प्रेम का गान करना मेरी मंज़ूरी नहीं। ये रिश्ते जो बनते हैं शोर में, वो अक्सर टूट से जाया करते हैं, हमारा बंधन तो ख़ामोशी की नींव पर टिका है, इसे प्रदर्शन की भीड़ से दूर रखना चाहती हूँ, बाज़ार में इसका मोल लगाना मेरी मंज़ूरी नहीं। लोग समझेंगे नहीं, इस मौन की गहरायी को, पर मेरे लिए तुम हो, और तुम्हारी शख्सियत काफ़ी हैं, हर राह चलते को यह राज़ समझाना मेरी मंज़ूरी नहीं। हाँ, मेरी हर सुबह तुम्हारे नाम से खिलती है, हर शाम तुम्हारे ख़्याल में ढल जाती है। प्यार सारा तुम्हारा है, बस, इसे जग का तमाशा बनाना मेरी मंज़ूरी नहीं।
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