एक मुसाफ़िर
राहों पर निकला था एक मुसाफिर , पर कदम ना आगे बड़े, न पीछे लौटे। समय की धूल में थमा सा खड़ा , जैसे अपने ही परछाइयों में उलझे। मन में हजारों बातें, पर होठों तक एक ना पहुंची । सपनों की डोर उलझी ऐसी, जैसे गिरह कभी न सुलझी । मंजिल की तस्वीर धुंधली हो गई, दिशाएं भी अब अनजान लगी । हर मोड़ पर जैसे अंधेरा था, हर चाह अधूरी सी जान पड़ी । पर उस अंधकार के कोने में, एक दिया अब भी जलता है । नन्ही सी उम्मीद की लौ, मुसाफिर को संभालती है। शायद वही चिंगारी बनेगी राह, शायद वही रोशनी दिखाएगी पार। क़दम फिर चल पड़ेंगे कभी , और पाएगा मुसाफिर अपना संसार ।।
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