सुलझी हुई पहेलियां
यह आसू भी कितने अजीब है अपने दुख परेशानी की जगह गुस्से में पेश करते है। ऐसे कि खुद को खफा कर अपने को पा लेते है। सब्र कि पुल बांधकर परायों कि शोर में उम्मीद से कोई नाता ना रहा। आशाएं टूटने की जैसे आदत सी हो गई प्यार तो बहुत है पर अदा करने का वक्त नहीं। इस शहर की हवा में ही ऐसा कोई जादू है कि सोए अरमान जगा दे।
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