भावनाऐं
हां...इच्छायें बहुत प्रबल होती हैं। बस हाथों की लकीरें दुर्बल होती हैं.. आखिर चाहता तो मैं भी हूं.... आपके हाथ में मेरा हाथ हो, बस यही कल्पनाएं साथ हो ! ना कहीं पहुंचने की फिक्र हो, ना किसी रास्तों की बात हो ! फिर कल्पनाएं इतनी मजबूत हो जाएं हम खुद एक दूसरे के सबूत हो जाएं आप जो पूछो कि आखिर कितनी सुंदर हूं मैं तो समुंदर जितनी गहरी भावनाएँ..... मुझ में मकसूद हो जाएं जी चाहता है इठलाती हुई चेहरे की मुस्कान अपने हाथों पर रख कर सवारुं मैं आखिर इस ख्वाब के आलम को हकीकत में कैसे निखारूं मैं ????
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