ऐ जिन्दगी
मेरे अपनों में शुमार है तू भी ऐ जिन्दगी इतना तो सबर रख तुझे नहीं भूला पाती हूं मैं इस दिल पर इतना तो असर रख कभी तन्हा भी है तो कभी महफिलें भी है तू भी है खामोश मुझमें बसी कहीं मेरे होंठों पर तो कभी मेरी आंखों में फिर अचानक से ही तो जाती है बरस मेरे साथ रहना बहुत ही करीब ही कि अकेले होकर भी हम अकेले नही शोर हो तेरा और मेरा इतना मानो कोई ग़म मैंने झेले ही नहीं मेरी परछाई है..,आधार है तू ही तो अपनों जैसी तो नजर रख इक तू ही तो है हर पल मे साथ तो अपने इस दोस्त पर मेहर रख।।
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