मैं और तुम
मेरी अंतिम यात्रा में जब पहला कदम रखो तब याद करना वे सारी यात्राएं जो मैंने अकेले की. मुझे अंतिम विदाई देते मेरा चेहरा निहारते मन ही मन मुझे बिन बताए जाने का उलाहना ओढ़ाते याद करना मेरे तमाम फोन काल्स जिनमें पूछती रही कब आओगे. मेरी अंतिम इच्छा का अंदाजा लगाते याद करना मेरे वे सारे हंसते खिलखिलाते मन जो हर हाल में जीने का प्रयास करते अंततः थक कर चिरनिंद्रा में लीन हो गए. और फिर जब भी किसी से बताओगे कि मैं नहीं रही तब शायद तुम्हें अहसास होगा कि मैं कभी थी भी...
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