हरिगीतिका
* शीर्षक: माँ शारदे आओ करूँ स्वागत हृदय से, मैं उतारूँ आरती। हे शारदे आकर मुझे भी, ज्ञान दें माँ भारती।। विनती करूँ माँ आपकी मैं, शीघ्र आकर तार दें। इस भक्त पर आशीष बरसे, मूर्खता को मार दें।। अज्ञान का भंडार हूँ मैं, दूर हो सब मूढ़ता। करते रहें मुझपर कृपा माँ, ताकि समझूँ गूढ़ता।। मतिमंद हूँ भ्रम में सदा मैं, आप उसको अब हरें। विद्वान बन जाऊँ अभी भी, आज ही कुछ यूँ करें।। नरेन्द्र सिंह, 31.03.2025
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