बातों का मोह, शक्ल का समझौता
रूप की चमक तो ढलती धूप है, बदलते मौसमों का एक रूप है। देखकर चेहरा, लोग रिश्ते जोड़ लेते हैं, पर सच्चे जज़्बात अक्सर पीछे छोड़ देते हैं। शक्ल देखकर तो बस शादियाँ हुआ करती हैं, नुमाइशों में अक्सर ये रस्में जिया करती हैं। दो परिवारों का मेल, समाज का एक दस्तूर, चेहरा खूबसूरत हो, तो मानते हैं सब मंज़ूर। पर प्रेम? प्रेम तो उन बातों की गलियों में पनपता है, जहाँ इंसान, इंसान से रूबरू हुआ करता है। वो देर रात तक का जागना, वो अनकही बातें, वो लफ़्ज़ों में भीगी हुई, सर्द-सी रातें। बातों से ही तो रूह का रूह से मेल होता है, वरना जिस्मों का जुड़ना तो बस एक खेल होता है। जब लफ़्ज़ों की डोर से ख्यालात जुड़ जाते हैं, तब अंधेरों में भी मोहब्बत के रास्ते मिल जाते हैं। किसी के हंसने के लहजे पर दिल हार जाना, किसी की बातों में खुद को मुकम्मल पाना। जहाँ सादगी शब्दों में हो, और सच्चाई अंदाज़ में, वहीँ संगीत छिड़ा होता है, जीवन के साज़ में। शादी तो अक्सर एक सामाजिक करार है, पर बातों वाला प्रेम, रूह का इकरार है। चेहरा तो वक्त की धूल से धुंधला पड़ जाएगा, पर बातों का जादू उम्र भर साथ निभाएगा। सत्य यही है: सूरतें तो बस आँखों को लुभाती हैं, पर सीरत और बातें सीधे दिल में घर कर जाती हैं।
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