वह आसमाँ
वह आसमाँ जिसे मैं ढूँढती हूँ भीड़ से दूर, शोर से परे, जहाँ मैं सिर्फ़ 'मैं' होऊँ, और मेरे सिर पर वह नीला विस्तार हो, जो न कुछ छुपाता है, न कुछ जताता हो। वो आसमान जो बनावटी उजालों से मिला नहीं हुआ, जहाँ बादल किसी कहानी की तरह नहीं, बल्कि एक सच की तरह तैरते हैं, बिल्कुल वैसे ही, जैसे वे हैं अनंत और आज़ाद। वह जो शाम के साथ में गहरा होता है , जहाँ हर सितारा अपनी जगह पर अडिग है, किसी चमक-धमक की होड़ में नहीं, बल्कि अपने होने के प्रमाण में जल रहा है। वही आसमान सच्चा है, जिसमें मेरी तन्हाई को पनाह मिले, वह साफ़ सुथरा आईना, जिसमें कुदरत का चेहरा बेनकाब दिखे। जब दुनिया सो जाती है, और सिर्फ़ मेरी साँसों की आवाज़ बाकी रहती है, तब वह आसमान मुझसे बातें करता है। बिना शब्दों के, बिना वादों के, वह मुझे बताता है कि विशाल होना क्या है, और शून्य होकर भी सब कुछ होना क्या है। मुझे उसी सच की तलाश है, जो सिर्फ़ अकेलेपन की कोख में मिलता है, जहाँ मैं और वह आसमाँ एक हो सकें बिना किसी पर्दे के, बिना किसी झूठ के, बस एक साफ़, सुंदर और अटल सच्चाई की तरह।
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