गूंजते सन्नाटे
बेटी बस कहने को रह गई लक्ष्मी, बेटों ने किया ऐसा नाम नहीं रही बेटी कहीं सुरक्षित बेटों ने किए ऐसे काम। करके मानवता को शर्मिंदा गवां दिए बेटों ने होश, पूछ रहीं है सबसे बेटी, क्या मेरा बेटी होना ही है दोष। परिवार की इज्जत, सपनों की कब्र, तुम देर शाम तक बाहर नहीं घूम सकती तुम्हे कपड़े ढंग से पहनने चाहिए, तुम अपने पति की सेवा करोगी न कि वो तुम्हारी, खाना तुम बनाओगी वो नहीं, सास के पैर दवाओगी, सबके खाना खाने के बाद तुम खाओगी। इतनी बंदिशों के बावजूद करना पड़ता है बेटी को त्याग, फिर भी झेलती बेटी ही अपने खिलाफ अत्याचार। धिक्कार है तुम्हारे ऐसे पुरुषत्व पर, जिस लड़की की तुमपे पड़े नजर वो मुस्कुरा के करे सिर ऊपर ओर निकले उसके मन का भय तब मानू तुम हो हमारी बेटियों के लिए अभय। कलम - प्रशांत चौहान
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