माहादेवा
महादेवा ====================== करो शांत ऊन की आत्मा, जो जलन रखते है आच्छे ईंन्सानीयत से, जीतेजी जलके मरते है बार बार, समजावो उन्हे, आच्छे क्या होते है करम. हे प्रभु बोज बने धरतीपे ये , ईंन्सानीयत के दुष्शमन, करो ईनपे कुछ करम, वरणा खाॅं जायेंगे ये, आच्छे और सच्चे ईंन्सानीयत का धरम. बंद करो भगवान तुम्हारे, लंबे नायकी प्रतीक्षा, जलद करो ईनके, कर्मो का करम. हे प्रभु आशा तुम्ही से अब, बाकी तो ऑंखमीचोलीका है आलम, ऑंखे होकर भी........ , सह रहे है बुरे लोगो का करम, सह रहे है बुरे लोगो का करम. =========================
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
