करते हैं....
उसकी तस्वीर को रात में झांका करते हैं.... ये बादल हम पर कम ही बरसा करते हैं.... मेरी तन्हाई उसे क्या ही समझ आएगी, जिसके कानों को झुमके तरसा करते हैं.... आंखों की तारीफ़ तो मैंने कर दी है, अब उसके होठों पर भी चर्चा करते हैं.... असलियत ज़िंदगी की हमसे पूछो तुम, हम कैसे-कैसे ये सांसे बरता करते हैं.... उससे मिलने पर क्या ही पढ़ पाता हूं मैं, किताब आगे रखकर बस पन्ने पलटा करते हैं.... मेरे ख्वाबों को उसके परस्तार (fans) क्या जाने, मेरे बट्नों में उसके बाल भी उलझा करते हैं.... अब मैं इश्क़-ए-जंग से हार कर के लौटा हूं, ग़िज़ायती (unhealthy) लोग भी मुझपर हमला किया करते हैं....
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