समाज में बढ़ती दिखावे की प्रवृ
शीर्षक : समाज में बढ़ती दिखावे की प्रवृति ------------------------------------------------------- समय के साथ _ साथ बदलता समाज चलने लगा है ,चारों ओर "दिखावे की प्रवृति का राज " । प्रकट होती है दूसरों के समक्ष एक छद्म आवरण सी छवि आधुनिकता ने जकड़ रखी है, जिन्दगियां सभी की निजी। सबसे अधिक इस बदलाव में हाथ है सोशल साइट्स का जो करती है युवाओं में उत्पन्न दिवास्वप्न और सुंदर बनने की लालसा। मानसिक संतुलन व धैर्य का ये प्रवृति करती है विनाश लेकिन दूसरी ओर व्यावसायिकता के इस आयाम में निहित है देश का विकास । माना कि जमाने के अनुसार बदलनी ही चाहिए विकास की गति परंतु दिखावे की ऐसी प्रवृत्ति व आचरण कर देते हैं इंसान की दुर्गति । ऑनलाइन के दौर में करते हैं सब निजता का दिखावा फ़िर कौन जाने कब पड़ जाए बुरी नज़रों का साया । अक्सर लोग सभी की खुशियों व कामयाबी से ईर्ष्या का भाव जताए क्यों न फिर शांति से बिना दिखावा किए हुए अपनों के संग सभी खुशियों को मनाए । दिखावे की इस जिंदगी से हमें अब बाहर आना होना आने वाली पीढ़ी के समक्ष समय देकर उनको अपने संस्कारों और परंपराओं से पुनः अवगत करवाना होगा । अलगाववाद ,और बिखरते रिश्तों को बचाने हेतु सभी को संयुक्त बैठकर हल निकाल बतलाना चाहिए । हमारे भारतीय परिवेश को दिखावे से मुक्त कर नव उमंग और हर्षोलास युक्त सहज बनाना चाहिए। स्वाति की कलम से ✍️
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