बेटी हूं मैं
दुनिया का यह कैसा खेल है जहां हर पल अपनों ने खेला है टूट सांस रही है बस ऐसे मेरी अपनी व्यथा किसे सुनाऊं मैं थी एक नन्ही सी जान मै बुने थे सपने मैं भी अपने जीवन में सोचा था एक दिन लड़कर जीत जाऊंगी पर इस जीवन में हार गई मैं आया नहीं कोई मेरी पीड़ा को हरने वाला न जाने यह कैसा खेल खेल रहा है मेरे से ऊपर वाला कभी बेटी तो कभी मां तो कभी बहन और प्रेमिका बनाकर हर रिश्ते को मैंने निभाया था फिर भी यह समाज ने मेरे ही चरित्र में दाग बताया था
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