सखी और संवेदना
************* स्त्रियों तुम समझना, दूसरी स्त्री को, बनना उनकी ऐसी सखी, जिससे वो सबकुछ कह पाए.. तुम सुनना उन्हें, उनकी भावनाओं को, उन्हें परखना नहीं, उनका साथ देना, पीठ थपथपाना, उनकी हर उपलब्धि पर, प्रयास करना, तुम्हारे देखे दुःख, उनके हिस्से कभी न आये, तुम्हारी तरफ से...... उनकी उड़ान में, एक पंख अपना भी जोड़ना, उनकी कलम में, अपने अक्षर उकेरना... मत करना ईर्ष्या, मत रखना द्वेष, तुम बनना प्रेम, करुणा, सहानभूति, जिसकी तुम पर्याय हो, उनके श्रृंगार में, तुम बनना काला टीका, बचाना हर बुरी नज़र से... तुम सागर नहीं, नदी बनना, मिलाकर अन्य नदियों को, एक हो जाना और विस्तृत भी तुम थामकर उनका हाथ, चूमना लकीरो को, करना एक अटूट वादा, #स्त्री_बने_रहने_का.... #एक_स्त्री_की_कहानी_में... ******************** स्वाति दुबे सिवनी
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