एक रोज तुम
तू चीज नायाब आफरीन, मै चाँद का गुजारा करता हूँ... आहिस्ता आहिस्ता सिसक गये... मैं सूरज के अश्को को पीता हूँ... एक कलम, एक कफन, चादर ओढ़, स्याही पिरोकर जीता हूँ... मैं जज़्बात करीब से लिखता हूँ, रंगों और अफवाहों में मैं कम ही सबको दिखता हूँ... है हैरान आसमान मुझसे,मैं आसमा जेब में लिये फिरता हूँ... एक आसमा अफवाहों का होता है,दुजा होता प्रीत दिला दा... मैं न पहले मे न दूसरे में,मैं उसके भ्रम में जीता हूँ... आग अब बुझती नहीं मेरी... मैं आहिस्ता अपनी ही समंदर कि वेग पीता हूँ... जिस गली में रुतबा है मेरा... मैं उस गली में अपने शेर चीखता हूँ... एक गाँव हैं जहाँ मैं धीमे पैर जाया करता हूँ... और उसकी ही एक गली कि एक छोर पर अपना जीवन जीता हूँ...
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