खामोशी
खामोशी =================== आलम कुछ कुछ, खामोशी का ये माजरा क्या है, दरवाजे पे तेरे रेखाकींत, आज रंगली भी हर रोज से कुछ और है. भगवान के आगे फुल तो है, लेकीन बिखरे पडे है, समज मे नही आज माजरा क्या है, आज कुछ तो, हर रोज से अलग है. प्रेम और व्देष की भाषा से तो है परिचीत हु, ये तो कुछ और ही लीपी है, मेरे समज से बाहर, आज हर रोज से, कुछ तो आलग है. ये आने वाले तुफान का ईशारा तो नाही, बसी बासाई हमारी छोटी सी जिंदगी से, कीसीने की खीलवाड तो नाही......., !, जरुर कुछ तो है........, हर रोज से आलग.., जो हमारे समज से बाहर....., जो हमारे समज से बाहर. ===================
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
