बिखरे पंछी
छोड़ गया एक बार फिर उसी मुकाम पर जहां बरसो बैठे इंतजार किया था उनका। पानी धैर्य के बांध से फूटकर बह गया और सारी जंजीरें तोड़ हम बनकर आजाद पंछी खुले आसमान में ताजी हवा के पीछे अपने सपनों को अपने शर्तों पर पूरे करने ऊंची उड़ान बड़े उड़ चले।
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