तूफान
वो एक तूफान सा आया, और मैं तिनके के जैसे उसके साथ बह गयी। न कोई शिकायत की लबों ने, न कोई शोर मचाया, उस रफ़्तार के आगे मेरा वजूद भी मुस्कुराया। जो सहेज कर रखा था मैंने बरसों की मेहनत से, वो रेत का महेल एक पल में हाथ से छूट आया। मैंने चाहा था लहरों की दिशा को मोड़ देना, तय था शायद खुद को उस बेरुखी से जोड़ लेना। पर उस लहेर में ऐसी कशिश थी, ऐसा जुनून था, कि आसान लगा खुद को उसकी लहरों पर छोड़ देना। न जाने वो समंदर की गहराइयों का बुलावा था, या मेरी अपनी ही बंदिशों का कोई छलावा था। मैं उड़ती रही, बहती रही, बेफिक्र फिज़ाओं में, वो मंजर मेरी रूह के लिए एक नया दिखावा था। अब न ठिकाने की फिक्र थी, न साहिल की तलाश, न डूबने का खौफ था, न बचने की कोई आस। जब बहना ही मुकद्दर है उस असीम तूफान में, तो हर लहर में महसूस होता एक नया अहसास है वो एक तूफान सा आया, और मैं तिनके के जैसे उसके साथ बह गयी।
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