जैसा तुम चाहो
मैं वो मिट्टी हूँ जिसे तुम, कोई भी आकार दे देना, मैं वो कोरा सा कागज हूँ, जो चाहो सार दे देना। मिरे अस्तित्व की हस्ती, तुम्हारे हाथ में सौंपी, खिजां की धूप कह देना, या फिर कोई बहार दे देना। मैं वैसी हूँ, जैसी तुम मुझे चाहना चाहो। अगर चाहो कि मैं बन जाऊँ, साहिल की कोई रेत तो लहरें चूम जाएँगी, मुझे तुम प्यार दे देना। अगर चाहो कि मैं बनकर रहूँ, बस एक खामोशी, तो लब सिल लूँगी अपने मैं, मुझे इंकार दे देना। मैं वो दरिया नहीं जिसको, किनारों की ज़रूरत हो, मैं वो कश्ती हूँ जिसे तुम, बस पतवार दे देना। मेरी आँखों में तुम देखो, तो अपनी ही झलक पाना, मैं आईना बनूँ ऐसा, मुझे दीदार दे देना। तुम्हारी चाहतों के रंग में, मैं तो ऐसी रंग जाऊँ, कि अपना रंग ही भूलूँ, तुम्हीं में मैं सिमट जाऊँ। बुलाओ तुम अगर मुझको, तो मैं आवाज़ बन जाऊँ, सजाओ तुम अगर महफ़िल, तो मैं एक साज़ बन जाऊँ। न कोई शर्त है मेरी, न कोई मांग है तुमसे, मगर इक अर्ज़ है छोटी, कि बस आधार दे देना। मुझे पत्थर बना देना, अगर ये ज़िद है तुम्हारी, मगर अपने ही हाथों का, मुझे श्रृंगार दे देना। तुम मुझे जैसी चाहोगे, मैं वैसी ही दिखूँगी, तुम्हारी कलम ठहरेगी, तो मैं शायद खुद को लिखूँगी। मैं एक शून्य हूँ जो तुमसे पूर्ण हूँ , तुम्हारी जीत का मैं, एक मधुर उपहार बनूँगी। मेरी हस्ती का कोई स्वतंत्र व्याकरण नहीं है, तुम जो शब्द चुनोगे, मैं वही अर्थ बन जाऊँगी।
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