कुरूक्षेत्र की भूमि
कुरूक्षेत्र की भूमि पर, पांडव कौरव खड़े हुए कृष्ण बने हैं पार्थ के सारथी, भीष्म, द्रोण भी डटे हुए।। पंचजन्य उठाकर केशव ने, उद्घोष किया हैं भीष्म पर्तीयांचा खिचकर, दिशा को विछोभ किया हैं।। पर अर्जुन हैं सकुचाया सा, धीरज उसका डोल गया भीष्म, द्रोण को देख, क्यों क्रोध का ज्वाला बैठ गया?ये सब तो अपने हैं मेरे, अंतर्मन को कोश रहा नैनो से चलते आँसू को, क्षत्रिय वीर हैं घोट रहा।। वसुदेव थे धीर हुए, पार्थ को देख गंभीर हुए बोले कौन्तेय गांडीव कहाँ हैं, उसको गले लगाओ तुम यदि हो क्षत्रिय कुल के तो, अपना धर्म बचाओ तुम अर्जुन का मन मुरझाया हैं, अंतर्मन भर आया हैं बोला केशव क्या यही धर्म हैं? क्या यह न्याय या नियति हैं? अपने जन को सत्ता के खातिर, मिटाना किस धर्मराज की नीति हैं? हे माधव ! जरा दया करो, उचित दिशा दिखाओ तुम धर्म, मर्यादा की नीति का, शास्त्रीय गाथा सुनाओ तुम। देखो महाप्रभु अब खड़े हुए, अधर अनुरंजित भडे हुए।हे पांडु! सुनो, तुम्हे गीता का ज्ञान सुनाता हु धर्म मर्यादा की क्या नीति हैं, इसका बखान सुनाता हूँ। क्या भूल गए तुम चीर हरण को? या दुर्योधन की वाणी को, जहाँ लुटती हो अबला नारी, वहाँ वीर नही होते हैं मौन भीष्म द्रोण के इस अपराध को, क्या इतिहास नही कर सकता माफ़, तुम नही कर सकते पार्थ, तो सुदर्शन हाथ धरूँगा मैं, धर्म बचाने के खातिर, भीष्म का प्रण हरूंगा मैं ।।
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
